ख्वाहिशें ज़िन्दगी का उल्लास हैं.....हमें उन्हें जिंदा रखना है....:)
हमने अक्सर देखा है कि जब भी किसी इंसान से मिलो, उससे बातें करो तो पता चलता है कि उसने अपनी ज़िन्दगी कि ज़रूरतों को, परिवार कि ज़रूरतों को, और समाज कि ज़रूरतों को पूरा करने में खुद को कहीं खो चूका रहता है । कोई अन्य क्यूँ...हम स्वयं भी उसी नौका में सवार हैं। न जाने कितनी बार हम अपनी ज़रूरतों को पूरा करने में ख्वाहिशों को अनदेखा कर देते हैं।कहने को ये तो केवल शब्द मात्र हैं पर सोचो तो इनमे ज़मीन-आसमान का फर्क है।
चाहतें, ज़रूरतों को पूरा नहीं करती और ज़रूरतों को पूरा करने में, जाने कितनी ही चाहतें अधूरी रह जाती हैं।ज़िन्दगी इन्ही के बीच पिसती हुई मिल जाती है। चाहतों, ख्वाहिशों की मंजिल बहुत दूर होती है। इसलिए नहीं कि, उसका रास्ता लम्बा होता है बल्कि उसमे ज़रूरतों के मोड़ बहुत होते हैं. पर इसका मतलब नहीं कि हम ख्वाहिश रखना छोड़ दें...सपने नहीं देखेंगे तो वो पूरे कैसे होंगे??
इसलिए सपने ज़रूर देखने चाहिए, चाहतों को दिल में ज़रूर पालना चाहिए, उम्मीदों कि लौ को हमेशा जलाये रखना चाहिए...क्यूंकि कभी न कभी ज़िन्दगी की ज़रूरतें पूरी होंगी और मन ख्वाहिशों को पाने को लपक पड़ेगा।
इसलिए सपने ज़रूर देखने चाहिए, चाहतों को दिल में ज़रूर पालना चाहिए, उम्मीदों कि लौ को हमेशा जलाये रखना चाहिए...क्यूंकि कभी न कभी ज़िन्दगी की ज़रूरतें पूरी होंगी और मन ख्वाहिशों को पाने को लपक पड़ेगा।
और ये तो मैंने देखा है, अगर दिल से कोई चीज़ चाहो तो मिलती ज़रूर है...एक किस्सा याद आ रहा है..एक लड़की अपनी माँ से कढाई करना सीख रही थी, उसकी माँ ने पूछा क्या काढना चाहती हो तो उसने छोटा सा जवाब दिया...एक प्यारा-सा बगीचों वाला घर, जिसके आँगन में हमेशा फूल (खुशियाँ) खिले हों और छत सितारों से सजा हो. उसने अपने सपने को काढ लिया और रोज़ उसे देखकर ख्वाहिश करने लगी. पर घर में दुर्घटना हो गयी जिससे उसका सब कुछ खो गया पर वो दिल नहीं खोया जिसमे उसने वो सपना संजोया था...समय बीता,सदियाँ बीती, पर उम्मीदें, अभी भी पलकों पर बैठ कर उस पल को जीने का इंतज़ार कर रही थी। और एक दिन वो सपना साकार हुआ..उसको उसका प्यार मिला, घर-बार मिला और आज वो अपने घर के लॉन में पौधों को पानी डालते मिल जाती है।
ज़रूरतों को पूरा करने में ख्वाहिशों कि बलि चढ़ती है पर मन को बिना उदास किये उसको पूरा करने कि चाहत को बरकरार रखना चाहिए...आखिर ज़िन्दगी तो हमें एक ही मिली है। उसी में सब कुछ करना है।
"बस मन धीर धरे तो सब संभव है....
मन का उल्लास न मरे तो सब संभव है....
दिल में बचपन अठखेलियाँ करता रहे तो सब संभव है....
आँखों में सपनों का उजास न बुझे तो सब संभव है ।।"
wriiten & posted by:-
Renu Mishra

