Monday, May 18, 2015

तुम रिक्त स्थान अति-रिक्त कर गई !


बचपन में, इम्तिहानों में अक्सर एक सवाल आता था "रिक्त स्थान भरिये", माँ हमे इम्तिहान से पहले सारे जवाब रटाती और हम उसमे याद किये गए जवाबों को भर देते थे। सवाल आराम से हल हो जाता था। लेकिन जीवन मे किसी के चले जाने से हो गए रिक्त स्थान को भरने का जवाब तुम क्यों नहीं सिखला के गयी ? माँ, तुमने क्यों नहीं बतलाया कि, रिक्तता इतनी खलती है कि रातों को नींद आना मुहाल हो जाता है। आँख बंद करते ही सब कुछ वापस से फिल्म की रील की तरह दौड़ने लगता है। जाने कौन उन सारी बीती बातों को रिवाइंड कर देता है। तुम्हारे बिना जीने की जद्दोजहद मे एक महीना होने को आ रहा है लेकिन अब भी आँखें बंद करती हूँ तो कानों मे भाभी की वो चीत्कार, "दीदीsss...मम्मी नहीं रहीं...दीदी", तीर की तरह मन की तहों में जाकर धंस जाता है। कितनी कोशिश की इसको निकालने की, उस दर्द से पीछा छुड़ाने की लेकिन सब नाकाम रही । फिलहाल तो मुझे कोई तरीका नहीं सूझ रहा। मन के किनारों से दर्द रिस रिस कर आँखों के पोरों पर आकर अटक जा रहा है। कोई पुरानी बात याद आते ही वो गालों पर टप्प से ढुलक जा रहा है। कितनी कोशिश कर रही हूँ कि भूल जाऊँ...मुझे कोई चोट नही लगी, कोई दर्द नही हो रहा...तुम्हारी तरह मुस्कुराती रहूँ ...लेकिन माँ..तुम जैसा साहस मुझमे कहाँ? 

मुझे याद है, जब भी मैं उदास होती, जाने कैसे तुम्हे पता चल जाता...इतनी हज़ार किलोमीटर दूर रहती फिर भी तुम्हे मेरी उदासी का एहसास हो जाता और तुम फ़ोन कर लेती। कहती आज तुझे सपने में देखा...झूठी-सच्ची कहानी गढ़ती और जानने की कोशिश करती कि तुम्हारी बच्ची क्यों उदास है? मैं भी तुम्हारी तरकीबें जान गयी थी...छुपा ले जाती थी अपना दर्द। मगर आज जब सोते हुए, एक उधड़े ऊन के गोले सा कोई सपना मेरी संवेदनाओं को तार तार कर रहा था और मैं रोते बिलखते उठ बैठी और ज्यों ही फोन उठाकर तुम्हारा नंबर डायल किया, मन सन्न रह गया इस एहसास से कि, "दिस पर्सन डस नॉट एक्सज़िस्ट...आप जिस नंबर पर कॉल कर रहे हैं वो अब इस दुनिया में नहीं हैं।" और मैं...मैं केवल मोबाइल हाथ में लिए घंटों ज़ार-ज़ार हो रोती रही, बिलखती रही। तुम्हे ज़ोर ज़ोर से पुकारती रह गयी। इतने दिनों से हर पल अपने को झूठलाती रही कि तुम कहीं नहीं गयी...तुम मेरे पास हो। कितने सांत्वनाओं से अपने को छुपा लिया था कि मैं तो तुम्हारा ही हिस्सा हूँ। तुमसे ही बनी हूँ। तुम्हारे खून पानी हवा का क़तरा ही तो मेरे नस नस में दौड़ रहा है। जो तुम हो वही मैं हूँ। मगर सभी सांत्वनाएं खोखली दीवार की तरह ढह गयी थी। मैं समझ चुकी थी कि अब मैं तुम्हे कभी देख नहीं पाऊँगी, तुम्हे छू नहीं पाऊँगी और जीवन में तुम्हारी आवाज़ कभी भी नहीं सुन पाऊँगी। वो तुम्हारा मुझे...'रेनू...ए बच्ची' पुकारना, सुनने के लिए मेरे कान हमेशा के लिए तरस जायेंगे। बचेंगे तो केवल आंसुओं के नरम क़तरे और यादों के खट्टे-मीठे लम्हे। अब इन्ही के भरोसे ज़िन्दगी कटेगी। अब तुमसे दर्द छुपाने की सारी तरकीबें फेल हो गयी हैं। मुझसे तुम्हारे जाने का दर्द, तुम्हारे ना होने की बेचैनी छुपाये नहीं छुप रही। मन धुआँ धुआँ हो सुलग रहा है और आँखें दिसंबर की बरसात हो गयी है...आत्मा से प्राण तक, धड़कन से साँस तक...सब कुछ भीग गया है। यादों का सैलाब मन के किनारे पर ऐसे टकरा रहा है, लगता है जैसे एक रोज़ साँसों का बाँध तोड़ के ही दम लेगा।

लेकिन, जानती हूँ ऐसा होगा नहीं। तुम होने नहीं दोगी क्योंकि तुम बहुत चाहती थी मुझे। तुम जानती थी, गर मुझे पता चला कि तुम मुझे छोड़ के जाने वाली हो तो मैं तुम्हे जाने नहीं दूँगी। कोई ना कोई बहाना बना के रोक लूँगी इसलिए चुप से, मुझसे बिना कुछ बोले चली गयी। यहाँ तक कि पिछले महीने भी जब तुमसे मिलने आई तब भी तुम मुझे यही एहसास दिला रही थी कि तुम बिलकुल ठीक हो। अब अपने सहारे चल-फिर पा रही हो। मगर मैं जान गयी थी कि इतने सालों से तुममे जान फूंकती तुम्हारी हिम्मत अब जवाब दे रही है। पापा के जाने के बाद जिस हौसले से तुमने हम चारों को संभाला था...उसी हौसले के पंख अब तीतर-बितर हो फड़फड़ा रहे थे। कितनी कोशिश की थी उसको उम्मीदों का मलहम लगा जिलाने की मगर हर कोशिश अधूरी रह गयी। जैसे अभी हर पल हर लम्हा ख़यालों पर इख़्तियार किये हुए हो...काश! उस वक़्त ख़यालों पर सवार रहती...काश!! तुम मुझसे मीलों दूर ना होती। काश!!! तुम्हारी बेचैनी, परेशानी, कसमसाहट को मैं पहले समझ जाती तो तुम्हें अपने से जुदा नहीं होने देती। ये काश, अगर-मगर, शायद जैसे शब्द ज़िन्दगी की डिक्शनरी से डिलीट क्यों नही हो जाते। जो चाहते हो पाता।

मुझे याद है, उस दिन सुबह से ही कहीं मन नहीं लग रहा था। उस दिन फिर वही 30 नवंबर का खौफनाक दिन था, मैं धीरे-धीरे बेचैनी से, बिना किसी को कुछ कहे उस मनहूस दिन के बीत जाने का इंतज़ार कर रही थी। सोच रही थी, बस आज का दिन कट जाता फिर कोई चिंता नहीं थी। वो दिन मेरे जीवन मे काली-अंधेरी सुरंग वाली रात की तरह था। सुबह फोन पर खबर मिलते ही कि तुम्हारी तबीयत बिगड़ रही है, एक अनकहा डर समा गया था मुझमे और साँझ होते ही तुम्हारे ना होने की खबर मिलना हमारी आत्मा का सूरज अस्त होने जैसा था। इक अँधेरे ने मन को जकड़ लिया था और मैं घोंसले मे फड़फड़ाते चिड़िया के नन्हें बच्चे की तरह कातर मन से तुम तक पहुँचने को बेकल थी। रात के दस बज चुके थे...गाडी अपनी तेज़ रफ़्तार से इलाहबाद की ओर भागी जा रही थी लेकिन मैं, कहीं तुम तक रुक गयी थी। खुद को तुमसे इतना अलग और अकेला इससे पहले तब भी नहीं महसूस किया था जब आज ही के दिन तेरह साल पहले पापा हमें छोड़ के चले गए थे। कभी सोचा नहीं था कि फिर उसी अँधेरी सुरंग से गुज़रना होगा जहाँ से 13 साल पहले गुज़री थी। फिर वैसे ही पहले जैसी सर्द अँधेरी रात और फिर वही मेरी ग़म में डूबी नम आँखें जिससे भविष्य का कुछ भी देख पाना संभव नहीं। 30 नवंबर 2001 की उस रात कितने अरमानों को समेटने के लिए अपने मन के आँचल को मजबूत कर रही थी। खुद को बालकनी में खड़े हो समझा रही थी कि," ठीक है रेनू...कल भले ही ये माँ का आँगन, बाबुल का देस, भाई-बहन सहेलियों की तरह घुली-मिली गलियाँ नहीं होंगी लेकिन दिल को सुकून देता एक ख्वाब, कल हक़ीक़त मे तब्दील हो जाएगा। इन्ही सपनो को बुनते मेरी रात भोर की चादर ओढ़ने की तयारी में थी कि बुआ के चीत्कार ने...रेनू, देखो तुम्हारे पापा को क्या हो गया...मन के झीने आँचल को तार-तार कर दिया। तुम पापा को बाहों में पकडे ज़ोर ज़ोर से जगा रही थी...साहब उठिए...बोलिये कुछ...बोल क्यों नहीं रहे। रेनू देख बच्ची तेरे पापा को क्या हो गया और मैं स्तब्ध सी कभी उनका नब्ज़ पकड़ती तो कभी ज़ोर ज़ोर से हिला रही थी...रो रही थी...कहे जा रही थी...पापा, आप उठ जाइए...मैं कहीं नहीं जा रही, आपकी बिट्टी आपके साथ रहेगी। पहली बार ऐसा हुआ था जब पापा ने मेरी बात नही सुनी थी। मगर तुमसे...तुमसे तो मैं कुछ कह ही नहीं पायी...ना कुछ सुन पायी। कितना कुछ रोज़ का कहना-सुनना बाकी रह गया था।

रात भर आखें बरसती रही, ये सोच के आँसू थम नहीं रहे थे कि अब तुम्हें देखने को आँखें तरस जाएंगी। अब तुम कभी भी दरवाज़ा खोलते ही सामने के सोफ़े पर बैठी हुई नहीं मिलोगी। रात के दो बजे तक हमारे इंतज़ार मे दरवाज़े पर टकटकी लगाए तुम्हारी बूढ़ी आँखों से बरसते ममता के नेह मे हम अब कभी नहीं भीग पाएंगे। एक सपना टूट चुका था। हम ट्रेन से उतर घर की ओर बढ़े जा रहे थे। ये दुनिया का बाज़ार यूंही सजा हुआ था मगर तुम नहीं थी। बस तुम्हारे ख़याल थे जो सागर की लहरों की तरह जेहन से आ कर टकरा रहे थे। 


पिछली बार जाते हुए कभी नहीं सोचा था कि अगली बार तुमसे आखिरी भेंट होगी। घर के ऑटो रुकते ही हाथ-पाँव ठंडे पड़ने लगे। ये कैसा मंज़र आँखों के आगे तैरने वाला है, अंदाज़ा लगाने की हिम्मत ही नहीं थी। दरवाज़ा खोलते ही तुम्हारा निष्प्राण शरीर देख सब कुछ जड़ हो गया। बस मैं थी और तुम थी। और हमारे इर्द-गिर्द घूमता वो बीता हुआ सारा कालक्रम जिसमे एक-एक करके तुम संग बिताए सारे पल, ग़म, खुशियाँ, हंसी, उदासी समाये जा रही थी। तुम्हारा हाथ मुझसे छूटता जा रहा था और तुम अनंत काल के गर्त मे समाये जा रही थी। मैं चाह कर भी तुम्हारी उन उँगलियों को पकड़ नहीं पा रही थी जिन्हे पकड़ कर मैंने बचपन मे चलना सीखा, सही-गलत का रास्ता देखा, जिनसे तुमने मुझे क,,,घ लिखना सिखाया। उन ठंडे-पड़े हाथों को कैसे छोड़ देती जो अपने एहसासों की गर्मी से हममे ऊर्जा भर देती थी, जो नर्म मुलायम गरम रोटियों को तोड़-तोड़ हमे खिलाती और माथे को सहलाते हुए हमे धीमे से सुला देती और चुपके से फिर कामों मे लग जाती। आज भी तुम चुपके से ही गयी मगर हमेशा के लिए चिर-निद्रा मे।

हे ईश्वर! कितने निष्ठुर हो तुम। हमसे हमारी माँ छीनते तुम्हें ज़रा भी दया नहीं आई। बस एक बार हल्की-सी आहट कर देते, मैं उनकी बेलाग उखड़ती ठंडी साँसों को अपने सीने में तैरते खून से गर्म कर देती। मैं, उनमे और जीने का जज़्बा भर देना चाहती थी, अपनी बातों से उनमे हौसला भर देना चाहती थी...हाँ, जानती हूँ, ये सब केवल मैं अपने स्वार्थ के लिए चाहती थी...जिससे कि मैं खुश रह सकूँ, खुद पर इतनी अच्छी माँ पाने का नाज़ कर सकूँ। क्या इतनी-सी खुशी तुम्हें गवारा नहीं थी? वो कितनी अलग थी सबसे....उनका जीवन, दर्शन, चिंतन, नज़रिया, समझ औरों से बिलकुल अलग था। मेरी  उपलब्धियों पर फक्र से सर ऊँचा कर लेने वाली माँ को मैं खोना नहीं चाहती थी। इतना ही था तो तुम मुझे ले जाते। मेरे ना होने से उनका बड़का बच्चा ही खोता मगर माँ के ना होने हम सारे अनाथ हो गए। वो धुरी थी हमारी जिसके सहारे हम सभी दूर रह भी एक दूसरे से बंधे थे और उनके इर्द-गिर्द तारों की तरह चक्कर काटते रहते थे। अब मैं कहाँ जाऊं...किस से कहूँ कि अब मैं उस टूटते तारे की तरह हो गयी हूँ जिसको नही पता कि वो कहाँ जाएगा और क्या करेगा। आपको कैसे समझाऊं कि वो हमारे लिए गंगा के उस टिमटिमाते दीये की तरह थी जिसकी नन्ही-सी रौशनी, हमारे भीतर ज़िन्दगी के प्रति उल्लास को जिलाए रखती थी। दिल कैसे यकीन करे कि गंगा का नन्हा दीया बुझ चुका है। घर का उजास मिट चुका है घर की बैठक का वो कोना, जो पापा के जाने से रिक्त हुआ था अब अति...रिक्त हो चुका है !!

माँ तुम्हारा जाना
ज्यों नर्म बचपन का खो जाना
सहसा नए कोपल से
कोमल हृदय का
जड़ सा कठोर हो जाना
माँ तुम्हारा जाना

दुख की तपती दोपहरी मे
या भादों-सी आँखों की बदरी मे
ज्यों सर के ऊपर से,
ममता का छप्पर उठ जाना
माँ तुम्हारा जाना

खोलनी हो कोई गाँठ मन की
या बाँटना हो कोई दर्द जीवन का
मन की गति से पहुँचे
उन संदेसों का
बैरंग पाती हो जाना   
माँ तुम्हारा जाना

माँ तुम्हारा जाना
मन मे गहरे फैले रिक्तता का
अति---रिक्त हो जाना!!


(माँ की याद मे--- रेणु मिश्रा)

Thursday, March 19, 2015

वहां तक आज़ाद हूँ जहाँ तक ज़ंजीर है !!


प्रिय दोस्तों,
नमस्कार...आज बड़े दिनों के बाद फिर से इस ब्लॉग पर चहल कदमी करना शुरू किया है। पढ़िये स्त्री-विमर्श पर मेरा नया आर्टिक्ल। 


सदियों से चले आ रहे स्त्री-विमर्श से जुड़े कई प्रश्न कि 'स्त्री मुक्ति क्या है? उन्हें अधिकार क्यों नहीं पता या वो अपने हक़ से वंचित क्यों है? क्या संभावनाएं तलाश रही हैं स्त्रियां अपने अस्तित्व की स्वीकार्यता के लिए? सोच में, समझ में, विचारों में कितनी स्वतंत्र हैं कितनी परतंत्र इसका भान भी कैसे हो?', आज भी मुंह बाए वैसे ही खड़े हैं जैसे पहले थे। सवाल उठाने वाली स्त्रियां बदल गयी हैं लेकिन जवाब देने वाली पितृसत्तात्मक सोच आज भी यूँही उनके आज़ादी के विचार पर नाग की तरह कुंडली मार कर बैठी हुई है।

इस पर यह कहना कि आज की लड़कियां/स्त्रियां स्वतंत्रता का मूल्य नहीं समझती, वो स्वछंद हो चुकी हैं तो मैं ये बताने में बिलकुल भी गुरेज़ नहीं करुँगी कि पहले पता तो लगने दो, स्वंतंत्रता के बारे में, उन्हें आईडिया भी तो लगे कि उनका अस्तित्व भी है और उनकी भी समाज में उतनी ही हिस्सेदारी है जितनी पुरुषों की। उन्हें इसका भान तो पहले हो फिर उनकी स्वतंत्रता- स्वछँदता की सीमा रेखा तय की जा सकती है और उनके अधिकारों के विषय में बात हो सकती है क्योंकि अभी तो उन्हें इसी बात का आभास नहीं है कि वो किन सोचों में बंधी हुई हैं या यूँ कह लीजिये परतंत्र भी हैं। अभी वो पुरुषवादी सोच के चट्टान के नीचे दबी हुई हैं लेकिन उफ्फ्फ करना नहीं जानती। वो भीख में मिले कुछ अधिकारों और सम्मान से ही खुश हो जाती हैं। उन्होंने तो अभी बस आज़ादी का स्वप्न भर देखा है, आज़ाद ख्याल की फरमाइश तो अभी भी नहीं कर सकती। गीतकार पीयूष मिश्रा की ग़ज़ल का एक शेर जो औरत की आज़ादी के सन्दर्भ में कोरी सच्चाई बयां करता है-

“हसरते आज़ादी की ये अच्छी ताबीर है
वहां तक आज़ाद हूँ जहाँ तक ज़ंजीर है!!”

खयालों के पंख तो अभी फड़फड़ा ही नहीं पाये तो स्त्री स्वतंत्रता को स्वच्छदंता का जामा कैसे पहनाया जा सकता है? आज भी कार्यस्थल से लेकर घर तक, स्त्री पुरुष से अधिक काम करती है। घर परिवार से लेकर बच्चों तक को सम्भालने की जिम्मेदारी उन्ही के ऊपर होती है लेकिन फिर भी अगर ज़रा भी मुंह खोल कर अपने हक़ की बात कर ले तो उन्हें परिवार विरोधी मान लिया जाता है। उन्हें अपने हक़ के लिए मुकदमा लड़ना पड़ता है। कहा जाता है ससुराल स्त्री का अपना घर होता है। वहीँ उन की डोली उतरती है और वही से अर्थी तो क्यों नहीं ब्याह के साथ ही पति के घर में उसके नाम संपत्ति कर दी जाती है। क्यों उसे किसी और की दया पर जीने के लिए मजबूर किया जाता है। आज भी सुहाग उजड़ जाने पर उस पर अभागिन होने का विशेषण चस्पा दिया जाता है। ऐसे विशेषण हम पुरुषों के लिए क्यों नही अपनाते? क्योंकि ऐसा हमें सिखाया ही नहीं जाता। हमारे ऊपर अच्छी लड़की, सुशील पत्नी, सुलक्षणा माँ-बहन का या फिर भले घर की स्त्री का तमगा जो लगा दिया जाता है। बचपन से दादी- नानी, माँ- मौसी सबको गलत के लिए चुप रहना और हर बात पर हाँ में सर हिलाते रहने की जो परंपरा देखी है और उसके बाद उनको अच्छा घोषित कर जो महान होने का मैडल पहनाया जाते देखा है, बस उसी मैडल की आकांक्षा में हम अभी भी जुबान पर ताला लगाये बैठे हैं। सामाजिक व्यवस्था गाँव की हो, कसबे की या शहर की हो, पुरुष सत्तात्मक्ता हमारे रग रग में व्याप्त है। पुरुष का कोई भी रूप हो उनपर हावी पुरुषवादी सोच ही रहती है। पच्चीस प्रतिशत पढ़े लिखे या कहा जाए संवेदनशील पुरुषों को छोड़ दिया जाए तो बाकि पुरुषों की मानसिकता निम्न स्तर की ही होती है जिसमे स्त्रियों को 'माल' की निगाह से देखने से भी गुरेज़ नहीं किया जाता। हमारे समाज में बलात्कार, खाप, हॉनर किलिंग जैसी प्रवृतियां, इन्ही घटिया मानसिकता और नारकीय सोच की उपज है जहाँ स्त्रियों को वस्तु की तरह ट्रीट किया जाता है। उनके इनकार को पुरुष अपने अहम् से जोड़ लेते हैंउन पर दकियानूसी सोच हावी हो जाती है कि आखिर एक तुच्छ औरत कैसे अपनी जुबान खोल कुछ बोल सकती है या उसे मना कर सकती है। बस यहीं शुरू हो जाता है स्त्रियों को विलुप्त प्रजाति बनाने का खेल। 

यह पुरुषवादी सोच का ही नतीजा है आज अगर बेड़ियों को तोड़ने की बात या आज़ाद होने की बात की जाती है तो स्त्रियों पर परिवार तोड़ने या अराजकता फ़ैलाने जैसे आरोपों को मढ़ दिया जाता है। लेकिन यहाँ सोच का दूसरा नज़रिया इख्तियार करना होगा। हर पुरुषवादी सोच को ये मानना होगा कि स्त्री सम्बन्धों से मुक्ति नहीं बल्कि सम्बन्धों मे मुक्ति चाहती है। उसे भी स्पेस कि दरकार है। पुरुष को अपने सोच कि उंगली पकड़ा कर उसे अपने इशारे पर चलाने कि कवायद बंद करनी होगी। ये सोचना कि पुरुषवादी सोच के चश्मे से ही सब सच और सही दिखता है सरासर गलत होगा। उसे भी घर के छोटे मुद्दों से लेकर घर के बड़े मुद्दों तक अपना निर्णय लेने कि स्वतन्त्रता होनी चाहिए। उसे कमतर ना आँकते हुए उस पर विश्वास और भरोसा करने कि ज़रूरत है। हम स्त्रियाँ, परिवार को तोड़ कर तो कुछ करने के पक्ष में है ही नहीं लेकिन प्रश्न यह उठता है कि हमेशा बलिदान की जिम्मेदारी स्त्रियां ही क्यों निभाएं? क्यों स्त्रियाँ ही जग जीतने से पहले घर जीतने कि बात करें? क्यो स्त्रियाँ ही पायो जी मैंने राम रत्न धन पायो का राग आलाप पुरुषवादी अहम को शांत करें? इन ही क्यों मे ही इन का उत्तर भी छिपा है। क्योंकि जो एक बार सामंत बन जाता है वो इतनी जल्दी राजगद्दी नहीं छोड़ सकता। उसे अपनी विरदावली सुनने कि आदत पड़ चुकी होती है। मेरा मानना है कि चाहे कोई भी सत्ता हो जब तक कि सत्ता ना छोड़ने लोभ जड़ों में जमा रहेगा तब तक किसी का कुछ भी भला होने वाला नहीं। मानसिकता को और सोच को बदलने की ज़रुरत है। मर्द या औरत को नहीं। सत्ता हाथ से निकलने के भय से मर्द तो केवल उस सोच का प्रतिनिधित्व करता है। रही बात ज़िम्मेदारी कौन निभाए और कितनी निभाए, ही तो सारे फसाद की जड़ हैहम सामने वाले को दुख मे देख ही नहीं सकते। अपने हक़ के लिए भले ही आवाज़ ना निकाल पाये लेकिन दूसरों को समझाने की बात तो कभी सीखी ही नहीं। अनंत युगों से बलिदानी का पाठ पढ़ कर जो आए हैं। खून में बह रहा है ना चाकरी करना। वही देखा है अपनी माँ दादी को करते। रिक्वेस्ट नाम के शब्द कहाँ होते थे उनकी डिक्शनरी में। रिक्वेस्ट तो वो करती थी। चलिए ना जी खाना खा लीजिये, आप रहने दीजिये मैं फलाना फलाना सब काम कर लूँगी। शक्ति-स्वरूपा बनने ही लालसा रहती है हममे वरना पुरुषों को स्त्रियों से कहाँ कोई अपेक्षा है? ऐसा इसलिए है क्योंकि जैसी बचपन से हमारी कंडिशनिंग होती आई है बस उसी खांचे मे हम सोचते हैं। उसके इतर सोचने के लिए ना तो स्त्री हिम्मत दिखा पाती है और ना पुरुष उस अलग सोच को बर्दाश्त कर पाता है। नतीजा घर तोड़ने का, अराजकता फैलाने का आरोप स्त्रियॉं के सिर आ जाता है।  

इन्ही आरोपों प्रत्यारोपों से सांकल मे जकड़कर स्त्री-मुक्ति का मुद्दा जहां था वहीं का वहीं रह जाता है। हरेक स्त्री को स्त्री-विमर्श की वांछाओ को समझना होगा। सबका साथ सबका विकास जैसे सोच को समग्रता से अपने और अन्य स्त्रियों के भीतर पनपाना होगा। कोई बदलाव तब तक संभव नहीं जब तक कि खुद स्त्रियाँ दूसरी स्त्री को समझने का प्रयास नहीं करेगी। बस खांचे मे फिर रह कर खुश रहने मे कोई बदलाव संभव नहीं। हरेक स्त्री के दर्द को अपना दर्द मानना पड़ेगा तभी हरेक स्त्री खुश हो पाएगी। उन्हे महान होने के सर्टिफिकेट से कन्नी काटनी होगी। एक सामान्य स्त्री बनकर ही हर स्त्री का दुख समझ पाएंगे। दूसरी बात अपनी अस्मिता को पहचानना होगा। किसी भी गलत के इंकार या ना बोलने की परिपाटी चालू करनी पड़ेगी। हो सकता है एक-दो बार पुरुष मन को चोट लगे लेकिन बिना नकार के कोई बदलाव संभव नहीं। तीसरी बात, या समझना होगा कि बदलाव का बयार कोई बाहरी नहीं लाने वाला। इसकी शुरुआत हमे अपने घर से ही करनी होगी। अपनी बेटियों को हम इसलिए ना पढ़ाएँ कि उनकी अच्छे घर मे शादी हो सके, बल्कि इसलिए पढ़ाएँ जिससे वो अपने मे सक्षम हो सकें। वो आर्थिक दृष्टि से किसी पर भी आश्रित ना रहें और मानसिक आधार पर इतनी मजबूत रहे कि कोई दबाव मे लेकर कोई काम ना करा सके। वो अपने निर्णय स्वयं ले सके और हम उनकी आधारशिला बन उनको डगमगाने से बचाएं। अपने बेटों मे स्त्रियों के प्रति संवेदनशील होने का बीज बोना होगा। जिस दिन घर के कामों मे दोनों बराबर की हिस्सेदारी निभाने की प्रक्रिया समझ जाएंगे उस दिन से स्त्री-उत्थान का नया इतिहास शुरू हो जाएगा। लेकिन सभी की शुरुआत केवल और केवल घर से शुरू होगी। अब सोच को बदलने का समय आ गया है। जिस तरह आग की एक चिंगारी ने विकास के नए पहिये आविष्कार किया था उसी प्रकार जिगर मे लगे इस आग से स्त्रियाँ भी बदलाव की नयी क्रांति लाएँगी। मुक्ति का नए मार्ग तलाश पाएँगी। बस ज़रूरत है तो सोच बदलने की। एक स्त्री को दूसरी स्त्री की सखी बनने की। और इस आग को यूंही हवा देते रहने की।

(रेणु मिश्रा)
अनपरा, सोनभद्र
ईमेल- remi.mishra@gmail.com    





Monday, May 26, 2014

दिल्ली डायरी 💖


ऑटो में बैठी हुई हूँ। पायलिया हो ओ ओ...कुमार शानू और अलका याग्निक की आवाज़ में बज रहा है। मैं निशब्द हूँ। शाम रात की बाहों में उतर रही है और मैं दिन के ख्यालों में डूबी हूँ। 

आज अकेले रही, अपने में रही, आज वो रही जो मैं हूँ। हर रिश्तों से जुड़ के भी हर रिश्ते से जुदा बस अपने को जी रही थी। खुद को समझ रही थी, रेज़ा रेज़ा अपने को पा रही थी। अभी मैं वो थी जो मैं बचपन में हुआ करती थी। दुनिया की वो एक आम-सी  लड़की जो घर से बाहर निकलती तो पिता और भाई को बॉडीगॉर्ड नहीं बनाती और माँ की हिदायतों की पोटली घर की दहलीज़ पर ही छोड़ देती। मन में उमंग भरे, जीवन से लबालब, जहाँ जाना होता, बस निकल पड़ती। मन पर कोई बोझ नही रखती। जो मिलता था, उससे खुलकर मिलती थी। 

बस आज भी उसी अंदाज़ में रही। लाल किला के माथे पर फहरते तिरंगे में उस हवा को देखा जिसकी वजह से तिरंगा लहरा रहा था। मैं हवा हो चुकी थी, बिना किसी बोझ के बह रही थी...अपने मनचाहे ख़यालों में। कनॉट प्लेस पर ना जाने कितनी ही देर से यूँही बेवजह घूमती रही। ना किसी को पाने की ललक, ना किसी के चले जाने का शोक, ना किसी को खो देने का डर और ना ही कोई कसक. एक चाय की टपरी पर अकेले चाय पी। अपने मनपसंद दुकानों में गई, कुछ अपनी पसंद के कपड़े लिए। फिर वहीं पास बने सीटों पर, एक कोना पकड़कर, कानों में हैडफ़ोन लगाए, गाने सुनती रही। आते-जाते लोगों को देखती रही। कान में गाने कुछ बज रहे थे, और आस-पास बैठे लोगों के चेहरों के एक्सप्रेशन कुछ अलग कह रहे थे। किसी के होटों के साथ गाने के बोल मैच कर जाते तो, हँसी आ जाती। मैं ज़िन्दगी को बस ऐसा ही हल्का करके जीना चाहती थी और आज उसी तरह उन लम्हों को जिया। तभी ऑटो वाले ने पूछा, "आगे से लेफ़्ट लेना है या राइट?" मैं ख्यालों से बाहर आ गई और कहा, "कहीं नहीं मुड़ना, आगे चलिए।"

#रेणु मिश्रा #दिल्ली डायरी #direct दिल से 💖


Saturday, January 11, 2014

“नयी बीमारी...पुछेरिया”


भई अभी तक हमने तो जौंडिस, टाइफाइड, मलेरिया के बारे मे ही सुना था, झेला था पर अब लगता लगता है आज कल, लोग एक नयी बीमारी से संक्रमित हो गए हैं....”पुछेरिया- पूछ के करना”। जिसको देखो यार वो हर काम पूछ के करने लगा है। बड़ी तेज़ी से फैल रही है ये बीमारी...शायद बर्ड फ्लू से भी ख़तरनाक है। बर्ड फ्लू के लिए तो विदेश से लौटे हुए यात्रियों का संपर्क ज़रूरी है...किन्तु ये रोग तो मेट्रो शहरों से लेकर छोटे शहरों के हर नुक्कड़, हर चौराहे पर अनशन करता हुआ मिल जाएगा। इस बीमारी से ग्रसित इंसान अपना हर काम करने के लिए लोगों से राय लेने लगा है, एसएमएस करवाने लगा है, सोशल नेटवर्किंग साइट पर मित्रों से, अपने पंखों (fans)से पूछने लगा है, राह मे चलते लोगों को पकड़ के पूछने लगा है कि, भाईसाहब, सड़क क्रॉस करूँ कि नहीं....हद है बाइ गॉड!! छींकना है तो पूछना है, खाँसना है तो पूछना है...अब तो लगता है....खुदा वो दिन ना दिखा दे कि, लोग, ये भी ना पूछते हुए मिल जाएँ, कि ज़िंदा रहना है या नहीं”।  

भई अब तक तो हमने ये ही सुना था कि, “सुनो सबकी, करो मन की”....लेकिन शायद अब सिनारिओ बादल चुका है...अब हर काम पूछ के करना है। ठीक भी है....काम गलत हुआ तो ठीकरा फोड़ने के लिए कोई सर तो चाहिए ना ;) और गर खुदा-ना-खासते सही हो गया तो वाह-वाही लूटने का मौका मिल जाएगा और लोगों के बीच फ़ेमस हो जाएंगे सो अलग :D

इसलिए भाइयों और बहनों, डरने वाली कोई बात नहीं....इस बीमारी से आपके पांचों उंगली घी मे और सर कढ़ाई मे। और फिर ऐसा मौका कोई हाथ से (मेरा मतलब आप समझ रहे होंगे) जाने थोड़े ही देता है। ये एक सेलेब्रिटी स्टाइल quotient भी बन गया है....इस बीमारी से लोग आम से खास हो जा रहे हैं। 

पर हम तो कहते हैं भईया...खास बनाने पर अनार हो जाएगा...इतनी बीमारियाँ हैं, एक अनार से कितनों का इलाज हो पाएगा। इसलिए...आम को आम रहने दो, थोड़ा और पकने दो...एक पेड़ से कई और पेड़ बनेंगे...बउर फरेगा....हजारों लाखों की संख्या मे नए आम आएंगे...पके हुए, मंजे हुए...फिर कर देंगे वो हर बीमारी का इलाज। फिर उनके लिए हर चुनौती तीन पत्ती का खेल हो जाएगा, कोई इम्तिहान नहीं, जिसके रिज़ल्ट का हर किसी को इंतज़ार रहे। अभी की तरह नहीं...जहां, हर कोई औना-पौना, अदना-सा, बिना अलिफ बे पे ते पढे....नए बुहार को, अपना पास-फ़ेल का सर्टिफिकेट देने के लिए तैयार है। 

मार्क कीजिये अगर मैं कहीं गलत हूँ....बताइये सही हूँ कि नहीं?? अरे राम रे!! सब को इस बीमारी के बारे मे बताते लग रहा है मुझे भी इन्फ़ैकशन हो गया...भाई, बड़ा contagious है ये रोग...पुछेरिया ;)

Friday, August 24, 2012

Dil Ke Rakeeb!!!


Dear friends...
June ke uss post (shayad main aisi hi hoon!!!) ke baad aaj main aap sab se jud paayi hoon. Yaa fir yun kahun ki, shayad khud ko jod paayi hoon.
 Apne andar titar-bitar hue, bikhre se mann ko jod pana shayad badaa hi mushkil kaam hai. Aapko, dil ke un tukdo ko usi tarike se, usi kareene se sajana hota hai, jaisa ki wo pehle the. Aur aap unhe sajaa bhi lete hain par un dararon ka kya jo rishton ke darakne se pade hain!!!
Kuchh logon ke liye dosti, ek vyapar jaisa hai...wo usse isliye karte hain jisse unka kaam banta jaaye aur hum jaise buddhu-bakse, usse nibhane ke liye. Hamare liye jahan dosti ki kasauti- pyaar aur vishwas hai, unke liye swaarth, atma-ghaat hai~!!
Samajh nahi aata ki aise rishte ke sachhe yaa jhoothe hone ki kasauti kya hai...Kya nibhana hi dosti hai, fir chahe saamne wala uska use, apko bewkuf banane me kar raha ho. Log kaise bas apna- apna karne ke fer me dosti ko taak pe rakh dete hain...aapke vishwaas ko, ek kachhe dor ki tarah tod dete hain aur aap, bas dekhte reh jaate hain...bhauchakke!!! Aisa isliye kyunki shayad us rishte ke maayne, uski samajh, uski kadra kewal aapko hoti hai. Aap uski khushi me khush to dukh me double dukhi ho jaate hain parantu uske liye apka dukh, apki nakamyabi, apki mayusi...jashn ka sabab hota hai. Uske man ki kadwahat ko jaan ke aap jitna toot-te hain, ghut-te hain yaa fir bilakhte hain, utna hi aap, apne us "so called DOST" ko khush kar rahe hote hain. Uska motive poora kar rahe hote hain...yahan par bhi aap uska bhala hi soch rahe hote hain...kitne achhe dost hain aap. Itna kuchh hone par bhi kya aap use apna dost kahenge!!!
Shayad Nahi na...arre baba..BILKUL NAHI !!!
Beete do mahine jo main aap sab se door rahi...shayad mujhe yehi samajhne me lage. Ab to aap sab mujhe sach me budhhu-baksa hi samajh rahe honge. Mujhe is pal Raj Kapoor ji par filmaya gaya wo gana yaad aa rha hai..."Sab kuchh seekha humne..na seekhi hoshiyari. Sach hai duniya walon...ki hum hai Anari". Jaanti hoon aap sab bhi kuchh aisa hi soch rahe honge mere baare me par kya karen, kehte hain na ki, "Akal badaam khane se nahi...Zindagi me thokar khane se aati hai".
Isliye, finally...ab main unhe, apne Behtareen Life ki Book se unka chapter CLOSE kar chuki hoon. Apni memory me uploaded...Un sab ke naam ke aage se "DOSTI" jaise Pure n beautiful word ko delete kar chuki hoon. Ab mere liye, wo sab..Aise Ajnabi hain, jinhe main jaanti hoon, unki fitraton se unko pehchanti bhi hoon...par unse baat karne, even Hiii karne tak ki bhool main kabhi nahi kar sakti. Na akele mein aur na un chaar logon ke saamne jo hamesha "Log kya kahenge....afterall yahan sab ko saath me rehna hai..bla bla bla..huh!!" jaise vakyon se daraate hain.
Aaj aap sab se, apne dil ki baatein share karke dil ko achha mehsoos ho raha hai...ab main fir se zindagi ke utt-pataang rahon par dag bharne ke liye taiyaar hoon aur aaj bhi "Krishna-Sudama"..."Jai-Veeru" jaisi dosti ke kisse mann ko lubhaate hain aur yakeen dilaate hain ki aise bhi dost hote hain jo nishchal man se dosti ko nibhate hain. Panchtantra ke Unt(camel)- Siyaar ki kahani ke SIYAAR jaise nahi jo DIL KE RAKEEB(dushman) hote hain aur mauka padne par apko faans lete hain...Par unke liye us kahani jaisa hi ant hona chahiye..."Jaise Ko Taisa".
Chaliye Doston..Alvida na kehte hue.."Fir Milenge" ka vaada karti hoon...aur Kyunki Aap sab mere Dil ke Kareeb Hain...Isliye ye lekh padhne ke baad Un "Dil ke Rakeebon" se dhokha mat khayiega. Apni pratikriya zaroor dijiyega..Mujhe achha lagega!!
Apki Dost-
Renu

Thursday, May 10, 2012

Zindagi ke do raahe......



Aaj main zindagi ke aise do raahe par khadi hoon jahan ek galat faisla mere zameer ko jeevan bhar utthne nahi dega aur ek sahi faisla, chahe aage ki raah mushkil kar de par mujhe apni nazron se kabhi girne nahi dega.

Ab faisla mera hai ki main kya chunti hoon....ek asaan sa galat rasta yaa fir mushkilon bhara sahi rasta. Aap sab soch rahe honge ki mujhe nirnay yaa chunaav karne me itni kathinayi kyun ho rahi hai to uska kaaran mera darr hai, 'mere apno ke liye'.

Achha, agar aap meri jagah hote to kya karte...shayad aap bhi usi asmanjas me phans jaate jisme aapko lagta hai ki main fansi hoon.Par aisa nahi hai...mere saamne koi asmanjas nahi hai. Main apna chunav karne ke liye sarv-samarth hoon. Jo koi bhi hai wo mujhe, mere faisle se diga nahi sakta.Mujhe galat kaam ke liye manaa nahi sakta. Jis baat ke liye mera dil gawahi nahi deta,wo kaam main kabhi nahi karti. Phir iske liye chahe mujhe koi kitna bhi daraa le ya dhamka le.Meri antar-atma, jo mujhe sahi raaste pe chalne ke liye keh rahi hai, wo galat nahi ho sakti. Maine Ishwar se hamesha yehi prarthna ki hai ,"Mujhe itni shakti, saahas aur vivek dijiye ki main hamesha sanmarg par chal saku.Apne satya par hamesha adig rahun".

Mujhe 'Dilwale Dulhaniya le jayenge' movie ka ek dialogue, jab bhi main apne ko aisi paristhiti me paati hoon, to yaad aata hai ki.....
["Meri maa hamesha kehti thi....ki tumhe zindagi me hamesha do raaste milenge ek sahi aur ek galat....
galat raasta bahut aasan hota hai...wo tumhe apni taraf khichega...Galat raaste mein tumhe shuruwat mein bahut khushiya milengi....par anth me tumhari haar hogi...
aur sahi raaste mein bhale tumhe shuruwat me taklife mile...bahut sehna pade.....
par anth me jeet tumhari hogi.."]

Isliye isi vishwas ke saath ki "Satya ki hamesha vijay hoti hai aur asatya ki haar", Maine sahi raah pe chalne ka chunav kiya hai...ab chaahe jo ho..:-)
Do baat kehna chahungi, ho sakta hai isse aap meri paristhiti samajh saken....

"Main sach hoon, main saahas hoon...mujhko kisi baat ka darr nahi
 Teri galtiyon ke pulinde ka wazan, mere zameer se badhkar nahi
Main jaanti hoon...mujhe puchkara jayega, mujhe dhamkaya jayega...
Laalach se baat na bani to mujhe kamjoriyon se daraya jayega
Kintu main atal-satya ki fasal hoon, tum be-gairaton si banjar nahi....
Mere jo dil me hai wo muh pe hai...tum jaisi vish me bujhi khanjar nahi"
Aage kya hoga wo bhavishya ke garbh me hain parantu main aatm-glaani se mukt hoon...khush hoon...:-)
Mera bolg padhne wale guni-jan aap bhi zara sochna aur apni baat kehna...aapka din bhi meri tarah ujjawal ho..Rabba khair kare !!!



Saturday, April 28, 2012

सोचना क्या.....

 

कहते हैं, "मन का हो तो अच्छा और मन का हो तो और भी अच्छा "....पता नहीं इन बातों में सच्चाई कितनी हैआपने कभी ढूँढने की कोशिश की इसकी सच्चाई या गहराई को | कभी कभी तो लगता है, ये मन बहलाने के लिए होती हैं...या फिर ज्यादा ठेस ना पहुंचे इसलिए बस कह दी जाती हैं यूँ ही ।और अजीब बात तो ये है की मन को इससे सुकून भी मिलता है ।
 
ऐसा ही कुछ और याद आ रहा है मुझे...जैसे "समय से पहले या भाग्य से ज्यादा कभी कुछ नहीं मिलता", " लगताहै अभी संजोग नहीं है..." इत्यादिपर मुझे क्यूँ ऐसा लगता है इनकी सच्चाई का हम अनुमान नहीं लगा सकते क्यूँ  कि, जब चीज़ें हमारे अनुसार घटती हैं तो हम इन कथनों पर आँख मूँद कर विश्वास कर लेते हैं, अपने किये हुए कर्म का सारा श्रेय अपने भाग्य या समय को दे देते हैंऔर जब बातें अपेक्षा अनुसार नहीं होती तो धीरे से भाग्य का रोना रो देते हैंक्या भाग्य या समय से हम इतना बंधे हैं की उसके जंजाल से हम निकल नहीं पाते या फिर जान बूझकर निकलना नहीं चाहते...
 
खैर, अपना तो विश्वास है कि कभी इस बुद्धू बक्से से बहार निकल कर भी सोच लेना चाहिए। खिंची हुई लकीर पर चलने से बेहतर है कि अपना खुद का रास्ता बना लें...थोड़ी तकलीफ होगी...पैर में कांटे चुभेंगे, लोग बातें कहेंगे, मन एक बार को कहेगा कि,"चल वापस हो ले...पागल है क्या" ?? पर अगले ही पल उसे भी सुकून लगने लगेगा और दिल के किसी कोने से आवाज़ आएगी..."सोचना क्या...जो भी होगा देखा जायेगा"।मन खुद को उसी पल सारे चिंताओं, आशंकाओं, दुविधाओं से मुक्त पायेगा। खुद को हल्का महसूस करने लगेगा , बिल्कुल वैसे ही जैसे.... हाथ से छूटा, कोई हवा का गुब्बारा आकाश में निर्द्वंद भाव से उड़ता चला जाता है । उसे ना कोई रोकने वाला है, ना टोकने वाला ।


~ रेणु मिश्रा