मुझे याद है, जब भी मैं उदास होती, जाने कैसे तुम्हे पता चल जाता...इतनी हज़ार किलोमीटर दूर रहती फिर भी तुम्हे मेरी उदासी का एहसास हो जाता और तुम फ़ोन कर लेती। कहती आज तुझे सपने में देखा...झूठी-सच्ची कहानी गढ़ती और जानने की कोशिश करती कि तुम्हारी बच्ची क्यों उदास है? मैं भी तुम्हारी तरकीबें जान गयी थी...छुपा ले जाती थी अपना दर्द। मगर आज जब सोते हुए, एक उधड़े ऊन के गोले सा कोई सपना मेरी संवेदनाओं को तार तार कर रहा था और मैं रोते बिलखते उठ बैठी और ज्यों ही फोन उठाकर तुम्हारा नंबर डायल किया, मन सन्न रह गया इस एहसास से कि, "दिस पर्सन डस नॉट एक्सज़िस्ट...आप जिस नंबर पर कॉल कर रहे हैं वो अब इस दुनिया में नहीं हैं।" और मैं...मैं केवल मोबाइल हाथ में लिए घंटों ज़ार-ज़ार हो रोती रही, बिलखती रही। तुम्हे ज़ोर ज़ोर से पुकारती रह गयी। इतने दिनों से हर पल अपने को झूठलाती रही कि तुम कहीं नहीं गयी...तुम मेरे पास हो। कितने सांत्वनाओं से अपने को छुपा लिया था कि मैं तो तुम्हारा ही हिस्सा हूँ। तुमसे ही बनी हूँ। तुम्हारे खून पानी हवा का क़तरा ही तो मेरे नस नस में दौड़ रहा है। जो तुम हो वही मैं हूँ। मगर सभी सांत्वनाएं खोखली दीवार की तरह ढह गयी थी। मैं समझ चुकी थी कि अब मैं तुम्हे कभी देख नहीं पाऊँगी, तुम्हे छू नहीं पाऊँगी और जीवन में तुम्हारी आवाज़ कभी भी नहीं सुन पाऊँगी। वो तुम्हारा मुझे...'रेनू...ए बच्ची' पुकारना, सुनने के लिए मेरे कान हमेशा के लिए तरस जायेंगे। बचेंगे तो केवल आंसुओं के नरम क़तरे और यादों के खट्टे-मीठे लम्हे। अब इन्ही के भरोसे ज़िन्दगी कटेगी। अब तुमसे दर्द छुपाने की सारी तरकीबें फेल हो गयी हैं। मुझसे तुम्हारे जाने का दर्द, तुम्हारे ना होने की बेचैनी छुपाये नहीं छुप रही। मन धुआँ धुआँ हो सुलग रहा है और आँखें दिसंबर की बरसात हो गयी है...आत्मा से प्राण तक, धड़कन से साँस तक...सब कुछ भीग गया है। यादों का सैलाब मन के किनारे पर ऐसे टकरा रहा है, लगता है जैसे एक रोज़ साँसों का बाँध तोड़ के ही दम लेगा।
Direct दिल से.....
Dil se kaho...Khush raho..:-) Insaan khush aur halka tabhi mehsoos karta hai jab dil me aayi baatein bina kisi jhijhak ke keh de. To yahan kuchh aisi hi baatein direct dil se kahi jaa rahi hain...just enjoy reading n keep smiling..;-)
Monday, May 18, 2015
तुम रिक्त स्थान अति-रिक्त कर गई !
मुझे याद है, जब भी मैं उदास होती, जाने कैसे तुम्हे पता चल जाता...इतनी हज़ार किलोमीटर दूर रहती फिर भी तुम्हे मेरी उदासी का एहसास हो जाता और तुम फ़ोन कर लेती। कहती आज तुझे सपने में देखा...झूठी-सच्ची कहानी गढ़ती और जानने की कोशिश करती कि तुम्हारी बच्ची क्यों उदास है? मैं भी तुम्हारी तरकीबें जान गयी थी...छुपा ले जाती थी अपना दर्द। मगर आज जब सोते हुए, एक उधड़े ऊन के गोले सा कोई सपना मेरी संवेदनाओं को तार तार कर रहा था और मैं रोते बिलखते उठ बैठी और ज्यों ही फोन उठाकर तुम्हारा नंबर डायल किया, मन सन्न रह गया इस एहसास से कि, "दिस पर्सन डस नॉट एक्सज़िस्ट...आप जिस नंबर पर कॉल कर रहे हैं वो अब इस दुनिया में नहीं हैं।" और मैं...मैं केवल मोबाइल हाथ में लिए घंटों ज़ार-ज़ार हो रोती रही, बिलखती रही। तुम्हे ज़ोर ज़ोर से पुकारती रह गयी। इतने दिनों से हर पल अपने को झूठलाती रही कि तुम कहीं नहीं गयी...तुम मेरे पास हो। कितने सांत्वनाओं से अपने को छुपा लिया था कि मैं तो तुम्हारा ही हिस्सा हूँ। तुमसे ही बनी हूँ। तुम्हारे खून पानी हवा का क़तरा ही तो मेरे नस नस में दौड़ रहा है। जो तुम हो वही मैं हूँ। मगर सभी सांत्वनाएं खोखली दीवार की तरह ढह गयी थी। मैं समझ चुकी थी कि अब मैं तुम्हे कभी देख नहीं पाऊँगी, तुम्हे छू नहीं पाऊँगी और जीवन में तुम्हारी आवाज़ कभी भी नहीं सुन पाऊँगी। वो तुम्हारा मुझे...'रेनू...ए बच्ची' पुकारना, सुनने के लिए मेरे कान हमेशा के लिए तरस जायेंगे। बचेंगे तो केवल आंसुओं के नरम क़तरे और यादों के खट्टे-मीठे लम्हे। अब इन्ही के भरोसे ज़िन्दगी कटेगी। अब तुमसे दर्द छुपाने की सारी तरकीबें फेल हो गयी हैं। मुझसे तुम्हारे जाने का दर्द, तुम्हारे ना होने की बेचैनी छुपाये नहीं छुप रही। मन धुआँ धुआँ हो सुलग रहा है और आँखें दिसंबर की बरसात हो गयी है...आत्मा से प्राण तक, धड़कन से साँस तक...सब कुछ भीग गया है। यादों का सैलाब मन के किनारे पर ऐसे टकरा रहा है, लगता है जैसे एक रोज़ साँसों का बाँध तोड़ के ही दम लेगा।
Thursday, March 19, 2015
वहां तक आज़ाद हूँ जहाँ तक ज़ंजीर है !!
प्रिय दोस्तों,
नमस्कार...आज बड़े दिनों के बाद फिर से इस ब्लॉग पर चहल कदमी करना शुरू किया है। पढ़िये स्त्री-विमर्श पर मेरा नया आर्टिक्ल।
सदियों से चले आ रहे स्त्री-विमर्श से जुड़े कई प्रश्न कि 'स्त्री मुक्ति क्या है? उन्हें अधिकार क्यों नहीं पता या वो अपने हक़ से वंचित क्यों है? क्या संभावनाएं तलाश रही हैं स्त्रियां अपने अस्तित्व की स्वीकार्यता के लिए? सोच में, समझ में, विचारों में कितनी स्वतंत्र हैं कितनी परतंत्र इसका भान भी कैसे हो?', आज भी मुंह बाए वैसे ही खड़े हैं जैसे पहले थे। सवाल उठाने वाली स्त्रियां बदल गयी हैं लेकिन जवाब देने वाली पितृसत्तात्मक सोच आज भी यूँही उनके आज़ादी के विचार पर नाग की तरह कुंडली मार कर बैठी हुई है।
इस पर यह कहना कि आज की लड़कियां/स्त्रियां स्वतंत्रता का मूल्य नहीं समझती, वो स्वछंद हो चुकी हैं तो मैं ये बताने में बिलकुल भी गुरेज़ नहीं करुँगी कि पहले पता तो लगने दो, स्वंतंत्रता के बारे में, उन्हें आईडिया भी तो लगे कि उनका अस्तित्व भी है और उनकी भी समाज में उतनी ही हिस्सेदारी है जितनी पुरुषों की। उन्हें इसका भान तो पहले हो फिर उनकी स्वतंत्रता- स्वछँदता की सीमा रेखा तय की जा सकती है और उनके अधिकारों के विषय में बात हो सकती है क्योंकि अभी तो उन्हें इसी बात का आभास नहीं है कि वो किन सोचों में बंधी हुई हैं या यूँ कह लीजिये परतंत्र भी हैं। अभी वो पुरुषवादी सोच के चट्टान के नीचे दबी हुई हैं लेकिन उफ्फ्फ करना नहीं जानती। वो भीख में मिले कुछ अधिकारों और सम्मान से ही खुश हो जाती हैं। उन्होंने तो अभी बस आज़ादी का स्वप्न भर देखा है, आज़ाद ख्याल की फरमाइश तो अभी भी नहीं कर सकती। गीतकार पीयूष मिश्रा की ग़ज़ल का एक शेर जो औरत की आज़ादी के सन्दर्भ में कोरी सच्चाई बयां करता है-
“हसरते आज़ादी की ये अच्छी ताबीर है
वहां तक आज़ाद हूँ जहाँ तक ज़ंजीर है!!”
यह पुरुषवादी सोच का ही नतीजा है आज अगर बेड़ियों को तोड़ने की बात या आज़ाद होने की बात की जाती है तो स्त्रियों पर परिवार तोड़ने या अराजकता फ़ैलाने जैसे आरोपों को मढ़ दिया जाता है। लेकिन यहाँ सोच का दूसरा नज़रिया इख्तियार करना होगा। हर पुरुषवादी सोच को ये मानना होगा कि स्त्री सम्बन्धों से मुक्ति नहीं बल्कि सम्बन्धों मे मुक्ति चाहती है। उसे भी स्पेस कि दरकार है। पुरुष को अपने सोच कि उंगली पकड़ा कर उसे अपने इशारे पर चलाने कि कवायद बंद करनी होगी। ये सोचना कि पुरुषवादी सोच के चश्मे से ही सब सच और सही दिखता है सरासर गलत होगा। उसे भी घर के छोटे मुद्दों से लेकर घर के बड़े मुद्दों तक अपना निर्णय लेने कि स्वतन्त्रता होनी चाहिए। उसे कमतर ना आँकते हुए उस पर विश्वास और भरोसा करने कि ज़रूरत है। हम स्त्रियाँ, परिवार को तोड़ कर तो कुछ करने के पक्ष में है ही नहीं लेकिन प्रश्न यह उठता है कि हमेशा बलिदान की जिम्मेदारी स्त्रियां ही क्यों निभाएं? क्यों स्त्रियाँ ही जग जीतने से पहले घर जीतने कि बात करें? क्यो स्त्रियाँ ही पायो जी मैंने राम रत्न धन पायो का राग आलाप पुरुषवादी अहम को शांत करें? इन ही क्यों मे ही इन का उत्तर भी छिपा है। क्योंकि जो एक बार सामंत बन जाता है वो इतनी जल्दी राजगद्दी नहीं छोड़ सकता। उसे अपनी विरदावली सुनने कि आदत पड़ चुकी होती है। मेरा मानना है कि चाहे कोई भी सत्ता हो जब तक कि सत्ता ना छोड़ने लोभ जड़ों में जमा रहेगा तब तक किसी का कुछ भी भला होने वाला नहीं। मानसिकता को और सोच को बदलने की ज़रुरत है। मर्द या औरत को नहीं। सत्ता हाथ से निकलने के भय से मर्द तो केवल उस सोच का प्रतिनिधित्व करता है। रही बात ज़िम्मेदारी कौन निभाए और कितनी निभाए, यही तो सारे फसाद की जड़ है। हम सामने वाले को दुख मे देख ही नहीं सकते। अपने हक़ के लिए भले ही आवाज़ ना निकाल पाये लेकिन दूसरों को समझाने की बात तो कभी सीखी ही नहीं। अनंत युगों से बलिदानी का पाठ पढ़ कर जो आए हैं। खून में बह रहा है ना चाकरी करना। वही देखा है अपनी माँ दादी को करते। रिक्वेस्ट नाम के शब्द कहाँ होते थे उनकी डिक्शनरी में। रिक्वेस्ट तो वो करती थी। चलिए ना जी खाना खा लीजिये, आप रहने दीजिये मैं फलाना फलाना सब काम कर लूँगी। शक्ति-स्वरूपा बनने ही लालसा रहती है हममे वरना पुरुषों को स्त्रियों से कहाँ कोई अपेक्षा है? ऐसा इसलिए है क्योंकि जैसी बचपन से हमारी कंडिशनिंग होती आई है बस उसी खांचे मे हम सोचते हैं। उसके इतर सोचने के लिए ना तो स्त्री हिम्मत दिखा पाती है और ना पुरुष उस अलग सोच को बर्दाश्त कर पाता है। नतीजा घर तोड़ने का, अराजकता फैलाने का आरोप स्त्रियॉं के सिर आ जाता है।
Monday, May 26, 2014
दिल्ली डायरी 💖
ऑटो में बैठी हुई हूँ। पायलिया हो ओ ओ...कुमार शानू और अलका याग्निक की आवाज़ में बज रहा है। मैं निशब्द हूँ। शाम रात की बाहों में उतर रही है और मैं दिन के ख्यालों में डूबी हूँ।
आज अकेले रही, अपने में रही, आज वो रही जो मैं हूँ। हर रिश्तों से जुड़ के भी हर रिश्ते से जुदा बस अपने को जी रही थी। खुद को समझ रही थी, रेज़ा रेज़ा अपने को पा रही थी। अभी मैं वो थी जो मैं बचपन में हुआ करती थी। दुनिया की वो एक आम-सी लड़की जो घर से बाहर निकलती तो पिता और भाई को बॉडीगॉर्ड नहीं बनाती और माँ की हिदायतों की पोटली घर की दहलीज़ पर ही छोड़ देती। मन में उमंग भरे, जीवन से लबालब, जहाँ जाना होता, बस निकल पड़ती। मन पर कोई बोझ नही रखती। जो मिलता था, उससे खुलकर मिलती थी।
बस आज भी उसी अंदाज़ में रही। लाल किला के माथे पर फहरते तिरंगे में उस हवा को देखा जिसकी वजह से तिरंगा लहरा रहा था। मैं हवा हो चुकी थी, बिना किसी बोझ के बह रही थी...अपने मनचाहे ख़यालों में। कनॉट प्लेस पर ना जाने कितनी ही देर से यूँही बेवजह घूमती रही। ना किसी को पाने की ललक, ना किसी के चले जाने का शोक, ना किसी को खो देने का डर और ना ही कोई कसक. एक चाय की टपरी पर अकेले चाय पी। अपने मनपसंद दुकानों में गई, कुछ अपनी पसंद के कपड़े लिए। फिर वहीं पास बने सीटों पर, एक कोना पकड़कर, कानों में हैडफ़ोन लगाए, गाने सुनती रही। आते-जाते लोगों को देखती रही। कान में गाने कुछ बज रहे थे, और आस-पास बैठे लोगों के चेहरों के एक्सप्रेशन कुछ अलग कह रहे थे। किसी के होटों के साथ गाने के बोल मैच कर जाते तो, हँसी आ जाती। मैं ज़िन्दगी को बस ऐसा ही हल्का करके जीना चाहती थी और आज उसी तरह उन लम्हों को जिया। तभी ऑटो वाले ने पूछा, "आगे से लेफ़्ट लेना है या राइट?" मैं ख्यालों से बाहर आ गई और कहा, "कहीं नहीं मुड़ना, आगे चलिए।"
#रेणु मिश्रा #दिल्ली डायरी #direct दिल से 💖
Saturday, January 11, 2014
“नयी बीमारी...पुछेरिया”
Friday, August 24, 2012
Dil Ke Rakeeb!!!
Dear friends...
Thursday, May 10, 2012
Zindagi ke do raahe......
Aaj main zindagi ke aise do raahe par khadi hoon jahan ek galat faisla mere zameer ko jeevan bhar utthne nahi dega aur ek sahi faisla, chahe aage ki raah mushkil kar de par mujhe apni nazron se kabhi girne nahi dega.Ab faisla mera hai ki main kya chunti hoon....ek asaan sa galat rasta yaa fir mushkilon bhara sahi rasta. Aap sab soch rahe honge ki mujhe nirnay yaa chunaav karne me itni kathinayi kyun ho rahi hai to uska kaaran mera darr hai, 'mere apno ke liye'.
Achha, agar aap meri jagah hote to kya karte...shayad aap bhi usi asmanjas me phans jaate jisme aapko lagta hai ki main fansi hoon.Par aisa nahi hai...mere saamne koi asmanjas nahi hai. Main apna chunav karne ke liye sarv-samarth hoon. Jo koi bhi hai wo mujhe, mere faisle se diga nahi sakta.Mujhe galat kaam ke liye manaa nahi sakta. Jis baat ke liye mera dil gawahi nahi deta,wo kaam main kabhi nahi karti. Phir iske liye chahe mujhe koi kitna bhi daraa le ya dhamka le.Meri antar-atma, jo mujhe sahi raaste pe chalne ke liye keh rahi hai, wo galat nahi ho sakti. Maine Ishwar se hamesha yehi prarthna ki hai ,"Mujhe itni shakti, saahas aur vivek dijiye ki main hamesha sanmarg par chal saku.Apne satya par hamesha adig rahun".
Mujhe 'Dilwale Dulhaniya le jayenge' movie ka ek dialogue, jab bhi main apne ko aisi paristhiti me paati hoon, to yaad aata hai ki.....
["Meri maa hamesha kehti thi....ki tumhe zindagi me hamesha do raaste milenge ek sahi aur ek galat....
Isliye isi vishwas ke saath ki "Satya ki hamesha vijay hoti hai aur asatya ki haar", Maine sahi raah pe chalne ka chunav kiya hai...ab chaahe jo ho..:-)
Main jaanti hoon...mujhe puchkara jayega, mujhe dhamkaya jayega...
Laalach se baat na bani to mujhe kamjoriyon se daraya jayega
Saturday, April 28, 2012
सोचना क्या.....
कहते हैं, "मन का हो तो अच्छा और मन का न हो तो और भी अच्छा "....पता नहीं इन बातों में सच्चाई कितनी है। आपने कभी ढूँढने की कोशिश की इसकी सच्चाई या गहराई को | कभी कभी तो लगता है, ये मन बहलाने के लिए होती हैं...या फिर ज्यादा ठेस ना पहुंचे इसलिए बस कह दी जाती हैं यूँ ही ।और अजीब बात तो ये है की मन को इससे सुकून भी मिलता है ।
ऐसा ही कुछ और याद आ रहा है मुझे...जैसे "समय से पहले या भाग्य से ज्यादा कभी कुछ नहीं मिलता", " लगताहै अभी संजोग नहीं है..." इत्यादि। पर मुझे क्यूँ ऐसा लगता है इनकी सच्चाई का हम अनुमान नहीं लगा सकते क्यूँ कि, जब चीज़ें हमारे अनुसार घटती हैं तो हम इन कथनों पर आँख मूँद कर विश्वास कर लेते हैं, अपने किये हुए कर्म का सारा श्रेय अपने भाग्य या समय को दे देते हैं। और जब बातें अपेक्षा अनुसार नहीं होती तो धीरे से भाग्य का रोना रो देते हैं । क्या भाग्य या समय से हम इतना बंधे हैं की उसके जंजाल से हम निकल नहीं पाते या फिर जान बूझकर निकलना नहीं चाहते...
खैर, अपना तो विश्वास है कि कभी इस बुद्धू बक्से से बहार निकल कर भी सोच लेना चाहिए। खिंची हुई लकीर पर चलने से बेहतर है कि अपना खुद का रास्ता बना लें...थोड़ी तकलीफ होगी...पैर में कांटे चुभेंगे, लोग बातें कहेंगे, मन एक बार को कहेगा कि,"चल वापस हो ले...पागल है क्या" ?? पर अगले ही पल उसे भी सुकून लगने लगेगा और दिल के किसी कोने से आवाज़ आएगी..."सोचना क्या...जो भी होगा देखा जायेगा"।मन खुद को उसी पल सारे चिंताओं, आशंकाओं, दुविधाओं से मुक्त पायेगा। खुद को हल्का महसूस करने लगेगा , बिल्कुल वैसे ही जैसे.... हाथ से छूटा, कोई हवा का गुब्बारा आकाश में निर्द्वंद भाव से उड़ता चला जाता है । उसे ना कोई रोकने वाला है, ना टोकने वाला ।




