ऑटो में बैठी हुई हूँ। पायलिया हो ओ ओ...कुमार शानू और अलका याग्निक की आवाज़ में बज रहा है। मैं निशब्द हूँ। शाम रात की बाहों में उतर रही है और मैं दिन के ख्यालों में डूबी हूँ।
आज अकेले रही, अपने में रही, आज वो रही जो मैं हूँ। हर रिश्तों से जुड़ के भी हर रिश्ते से जुदा बस अपने को जी रही थी। खुद को समझ रही थी, रेज़ा रेज़ा अपने को पा रही थी। अभी मैं वो थी जो मैं बचपन में हुआ करती थी। दुनिया की वो एक आम-सी लड़की जो घर से बाहर निकलती तो पिता और भाई को बॉडीगॉर्ड नहीं बनाती और माँ की हिदायतों की पोटली घर की दहलीज़ पर ही छोड़ देती। मन में उमंग भरे, जीवन से लबालब, जहाँ जाना होता, बस निकल पड़ती। मन पर कोई बोझ नही रखती। जो मिलता था, उससे खुलकर मिलती थी।
बस आज भी उसी अंदाज़ में रही। लाल किला के माथे पर फहरते तिरंगे में उस हवा को देखा जिसकी वजह से तिरंगा लहरा रहा था। मैं हवा हो चुकी थी, बिना किसी बोझ के बह रही थी...अपने मनचाहे ख़यालों में। कनॉट प्लेस पर ना जाने कितनी ही देर से यूँही बेवजह घूमती रही। ना किसी को पाने की ललक, ना किसी के चले जाने का शोक, ना किसी को खो देने का डर और ना ही कोई कसक. एक चाय की टपरी पर अकेले चाय पी। अपने मनपसंद दुकानों में गई, कुछ अपनी पसंद के कपड़े लिए। फिर वहीं पास बने सीटों पर, एक कोना पकड़कर, कानों में हैडफ़ोन लगाए, गाने सुनती रही। आते-जाते लोगों को देखती रही। कान में गाने कुछ बज रहे थे, और आस-पास बैठे लोगों के चेहरों के एक्सप्रेशन कुछ अलग कह रहे थे। किसी के होटों के साथ गाने के बोल मैच कर जाते तो, हँसी आ जाती। मैं ज़िन्दगी को बस ऐसा ही हल्का करके जीना चाहती थी और आज उसी तरह उन लम्हों को जिया। तभी ऑटो वाले ने पूछा, "आगे से लेफ़्ट लेना है या राइट?" मैं ख्यालों से बाहर आ गई और कहा, "कहीं नहीं मुड़ना, आगे चलिए।"
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