Monday, May 26, 2014

दिल्ली डायरी 💖


ऑटो में बैठी हुई हूँ। पायलिया हो ओ ओ...कुमार शानू और अलका याग्निक की आवाज़ में बज रहा है। मैं निशब्द हूँ। शाम रात की बाहों में उतर रही है और मैं दिन के ख्यालों में डूबी हूँ। 

आज अकेले रही, अपने में रही, आज वो रही जो मैं हूँ। हर रिश्तों से जुड़ के भी हर रिश्ते से जुदा बस अपने को जी रही थी। खुद को समझ रही थी, रेज़ा रेज़ा अपने को पा रही थी। अभी मैं वो थी जो मैं बचपन में हुआ करती थी। दुनिया की वो एक आम-सी  लड़की जो घर से बाहर निकलती तो पिता और भाई को बॉडीगॉर्ड नहीं बनाती और माँ की हिदायतों की पोटली घर की दहलीज़ पर ही छोड़ देती। मन में उमंग भरे, जीवन से लबालब, जहाँ जाना होता, बस निकल पड़ती। मन पर कोई बोझ नही रखती। जो मिलता था, उससे खुलकर मिलती थी। 

बस आज भी उसी अंदाज़ में रही। लाल किला के माथे पर फहरते तिरंगे में उस हवा को देखा जिसकी वजह से तिरंगा लहरा रहा था। मैं हवा हो चुकी थी, बिना किसी बोझ के बह रही थी...अपने मनचाहे ख़यालों में। कनॉट प्लेस पर ना जाने कितनी ही देर से यूँही बेवजह घूमती रही। ना किसी को पाने की ललक, ना किसी के चले जाने का शोक, ना किसी को खो देने का डर और ना ही कोई कसक. एक चाय की टपरी पर अकेले चाय पी। अपने मनपसंद दुकानों में गई, कुछ अपनी पसंद के कपड़े लिए। फिर वहीं पास बने सीटों पर, एक कोना पकड़कर, कानों में हैडफ़ोन लगाए, गाने सुनती रही। आते-जाते लोगों को देखती रही। कान में गाने कुछ बज रहे थे, और आस-पास बैठे लोगों के चेहरों के एक्सप्रेशन कुछ अलग कह रहे थे। किसी के होटों के साथ गाने के बोल मैच कर जाते तो, हँसी आ जाती। मैं ज़िन्दगी को बस ऐसा ही हल्का करके जीना चाहती थी और आज उसी तरह उन लम्हों को जिया। तभी ऑटो वाले ने पूछा, "आगे से लेफ़्ट लेना है या राइट?" मैं ख्यालों से बाहर आ गई और कहा, "कहीं नहीं मुड़ना, आगे चलिए।"

#रेणु मिश्रा #दिल्ली डायरी #direct दिल से 💖


Saturday, January 11, 2014

“नयी बीमारी...पुछेरिया”


भई अभी तक हमने तो जौंडिस, टाइफाइड, मलेरिया के बारे मे ही सुना था, झेला था पर अब लगता लगता है आज कल, लोग एक नयी बीमारी से संक्रमित हो गए हैं....”पुछेरिया- पूछ के करना”। जिसको देखो यार वो हर काम पूछ के करने लगा है। बड़ी तेज़ी से फैल रही है ये बीमारी...शायद बर्ड फ्लू से भी ख़तरनाक है। बर्ड फ्लू के लिए तो विदेश से लौटे हुए यात्रियों का संपर्क ज़रूरी है...किन्तु ये रोग तो मेट्रो शहरों से लेकर छोटे शहरों के हर नुक्कड़, हर चौराहे पर अनशन करता हुआ मिल जाएगा। इस बीमारी से ग्रसित इंसान अपना हर काम करने के लिए लोगों से राय लेने लगा है, एसएमएस करवाने लगा है, सोशल नेटवर्किंग साइट पर मित्रों से, अपने पंखों (fans)से पूछने लगा है, राह मे चलते लोगों को पकड़ के पूछने लगा है कि, भाईसाहब, सड़क क्रॉस करूँ कि नहीं....हद है बाइ गॉड!! छींकना है तो पूछना है, खाँसना है तो पूछना है...अब तो लगता है....खुदा वो दिन ना दिखा दे कि, लोग, ये भी ना पूछते हुए मिल जाएँ, कि ज़िंदा रहना है या नहीं”।  

भई अब तक तो हमने ये ही सुना था कि, “सुनो सबकी, करो मन की”....लेकिन शायद अब सिनारिओ बादल चुका है...अब हर काम पूछ के करना है। ठीक भी है....काम गलत हुआ तो ठीकरा फोड़ने के लिए कोई सर तो चाहिए ना ;) और गर खुदा-ना-खासते सही हो गया तो वाह-वाही लूटने का मौका मिल जाएगा और लोगों के बीच फ़ेमस हो जाएंगे सो अलग :D

इसलिए भाइयों और बहनों, डरने वाली कोई बात नहीं....इस बीमारी से आपके पांचों उंगली घी मे और सर कढ़ाई मे। और फिर ऐसा मौका कोई हाथ से (मेरा मतलब आप समझ रहे होंगे) जाने थोड़े ही देता है। ये एक सेलेब्रिटी स्टाइल quotient भी बन गया है....इस बीमारी से लोग आम से खास हो जा रहे हैं। 

पर हम तो कहते हैं भईया...खास बनाने पर अनार हो जाएगा...इतनी बीमारियाँ हैं, एक अनार से कितनों का इलाज हो पाएगा। इसलिए...आम को आम रहने दो, थोड़ा और पकने दो...एक पेड़ से कई और पेड़ बनेंगे...बउर फरेगा....हजारों लाखों की संख्या मे नए आम आएंगे...पके हुए, मंजे हुए...फिर कर देंगे वो हर बीमारी का इलाज। फिर उनके लिए हर चुनौती तीन पत्ती का खेल हो जाएगा, कोई इम्तिहान नहीं, जिसके रिज़ल्ट का हर किसी को इंतज़ार रहे। अभी की तरह नहीं...जहां, हर कोई औना-पौना, अदना-सा, बिना अलिफ बे पे ते पढे....नए बुहार को, अपना पास-फ़ेल का सर्टिफिकेट देने के लिए तैयार है। 

मार्क कीजिये अगर मैं कहीं गलत हूँ....बताइये सही हूँ कि नहीं?? अरे राम रे!! सब को इस बीमारी के बारे मे बताते लग रहा है मुझे भी इन्फ़ैकशन हो गया...भाई, बड़ा contagious है ये रोग...पुछेरिया ;)